ऊर्जा के स्रोत
ऊर्जा के स्रोत
ऊर्जा कार्य करने की क्षमता है। हमारे दैनिक जीवन की प्रत्येक गतिविधि—जैसे बल्ब जलाना, भोजन पकाना, वाहन चलाना, मशीनों का संचालन करना या मोबाइल फोन चार्ज करना—ऊर्जा पर निर्भर करती है। ऊर्जा की बढ़ती मांग और उसके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण यह अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
इस अध्याय में ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों, उनके लाभ एवं हानियों तथा सतत विकास (Sustainable Development) की आवश्यकता का अध्ययन किया जाता है।
1. ऊर्जा के एक अच्छे स्रोत की विशेषताएँ
ऊर्जा के एक अच्छे स्रोत में निम्नलिखित गुण होने चाहिए:
- उच्च ऊर्जा उत्पादन: प्रति इकाई द्रव्यमान या आयतन अधिक ऊर्जा प्रदान करनी चाहिए।
- आसानी से उपलब्ध: लोगों के लिए सुलभ और आसानी से प्राप्त होने वाला होना चाहिए।
- भंडारण एवं परिवहन में सरल: इसे संग्रहित और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाना आसान होना चाहिए।
- किफायती: इसका उपयोग आर्थिक रूप से लाभदायक होना चाहिए।
- पर्यावरण-अनुकूल: इससे पर्यावरण को न्यूनतम हानि पहुँचनी चाहिए।
- सुरक्षित: इसमें आग, विस्फोट या विकिरण जैसे खतरों की संभावना कम होनी चाहिए।
2. पारंपरिक ऊर्जा स्रोत (Conventional Sources of Energy)
ये वे ऊर्जा स्रोत हैं जिनका उपयोग लंबे समय से किया जा रहा है।
(क) जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels)
जीवाश्म ईंधनों में कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस शामिल हैं। ये लाखों वर्षों तक जैविक पदार्थों के अपघटन से बनते हैं।
- कोयला: ताप विद्युत उत्पादन तथा उद्योगों में उपयोग।
- पेट्रोलियम: वाहनों में ईंधन के रूप में (पेट्रोल, डीज़ल, मिट्टी का तेल)।
- प्राकृतिक गैस: घरेलू उपयोग (CNG, LPG) तथा उद्योगों में।
लाभ:
- उच्च ऊर्जा उत्पादन।
- उपयोग में सरल।
- तकनीक अच्छी तरह विकसित।
हानियाँ:
- सीमित भंडार (अक्षय नहीं)।
- वायु प्रदूषण उत्पन्न करते हैं।
- वैश्विक तापन (Global Warming) एवं अम्लीय वर्षा (Acid Rain) के प्रमुख कारण।
(ख) ताप विद्युत संयंत्र (Thermal Power Plants)
इन संयंत्रों में कोयला या तेल जलाकर भाप उत्पन्न की जाती है, जो टर्बाइनों को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करती है।
- परिवहन लागत कम करने के लिए इन्हें कोयला या तेल क्षेत्रों के निकट स्थापित किया जाता है।
- इनसे बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
(ग) जल विद्युत संयंत्र (Hydro Power Plants)
बाँधों में संचित जल की स्थितिज ऊर्जा का उपयोग करके विद्युत उत्पन्न की जाती है। ऊँचाई से गिरता जल टर्बाइनों को घुमाता है।
लाभ:
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत।
- प्रत्यक्ष प्रदूषण नहीं।
हानियाँ:
- बाँध निर्माण से बड़े क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं।
- वनों का विनाश होता है।
- मनुष्यों और वन्यजीवों का विस्थापन होता है।
- प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
(घ) जैव ऊर्जा (Biomass Energy)
लकड़ी, फसल अवशेष, गोबर आदि जैसे जैविक पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा को जैव ऊर्जा कहते हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक बायोमास का उपयोग किया जाता है, लेकिन इससे अधिक धुआँ निकलता है।
- उन्नत बायोगैस संयंत्र (गोबर गैस संयंत्र) अवायवीय अपघटन द्वारा स्वच्छ ईंधन उत्पन्न करते हैं।
लाभ:
- नवीकरणीय एवं आसानी से उपलब्ध।
- बायोगैस संयंत्र ईंधन के साथ-साथ उत्तम खाद भी प्रदान करते हैं।
(ङ) पवन ऊर्जा (Wind Energy)
पवन चक्कियों (Wind Turbines) की सहायता से वायु की गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
10–15 किमी/घंटा या उससे अधिक गति वाली हवाओं वाले क्षेत्र इसके लिए उपयुक्त होते हैं।
लाभ:
- नवीकरणीय एवं प्रदूषण रहित।
हानियाँ:
- अधिक भूमि की आवश्यकता।
- स्थापना लागत अधिक।
- केवल तेज़ हवाओं वाले क्षेत्रों में प्रभावी।
3. गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत (Non-Conventional Sources of Energy)
जीवाश्म ईंधनों के समाप्त होने और पर्यावरणीय समस्याओं के कारण वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास किया जा रहा है।
(क) सौर ऊर्जा (Solar Energy)
सूर्य ऊर्जा का अंतिम एवं सबसे बड़ा स्रोत है।
उपकरण:
- सौर कुकर: सूर्य के प्रकाश को केंद्रित करके भोजन पकाने हेतु।
- सौर जल तापक: सौर पैनलों द्वारा पानी गर्म करने हेतु।
- सौर सेल (Photovoltaic Cells): सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं।
लाभ:
- नवीकरणीय एवं प्रचुर मात्रा में उपलब्ध।
- पर्यावरण-अनुकूल।
हानियाँ:
- सौर पैनल महंगे होते हैं।
- बादल या वर्षा के समय कार्यक्षमता कम हो जाती है।
- स्थापना के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता होती है।
(ख) समुद्र से ऊर्जा (Energy from the Sea)
1. ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy):
समुद्र में ज्वार-भाटा के उत्थान और पतन से प्राप्त ऊर्जा। ज्वारीय टर्बाइन इसे विद्युत में बदलते हैं।
2. तरंग ऊर्जा (Wave Energy):
समुद्री तरंगों की गतिज ऊर्जा से प्राप्त ऊर्जा।
3. महासागरीय तापीय ऊर्जा (Ocean Thermal Energy - OTE):
समुद्र की सतह के गर्म जल और गहराई के ठंडे जल के तापांतर का उपयोग कर विद्युत उत्पन्न की जाती है।
समस्याएँ:
- तकनीक अभी विकासशील अवस्था में है।
- कुछ विशेष स्थानों तक सीमित।
(ग) भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy)
पृथ्वी के अंदर मौजूद ऊष्मा का उपयोग भाप बनाने और टर्बाइन चलाने के लिए किया जाता है।
उदाहरण: मणिकरण (हिमाचल प्रदेश)
लाभ:
- नवीकरणीय स्रोत।
- दिन-रात उपलब्ध।
- पर्यावरण-अनुकूल।
हानियाँ:
- कुछ सीमित स्थानों पर ही उपलब्ध।
- स्थापना लागत अधिक।
(घ) नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy)
यूरेनियम-235 अथवा प्लूटोनियम-239 के नाभिकीय विखंडन (Fission) द्वारा प्राप्त ऊर्जा को नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं।
ईंधन की बहुत कम मात्रा से अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
भारत के प्रमुख नाभिकीय विद्युत संयंत्र:
- कलपक्कम
- तारापुर
- रावतभाटा
- नरोरा
- कुडनकुलम
लाभ:
- बहुत अधिक ऊर्जा उत्पादन।
- जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करता है।
हानियाँ:
- रेडियोधर्मी अपशिष्ट का निपटान कठिन एवं खतरनाक।
- विकिरण रिसाव एवं दुर्घटनाओं का खतरा।
- स्थापना लागत अत्यधिक।
4. ऊर्जा उपयोग के पर्यावरणीय प्रभाव
ऊर्जा उत्पादन की अधिकांश विधियाँ पर्यावरण को प्रभावित करती हैं:
- जीवाश्म ईंधन: प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैसें और अम्लीय वर्षा।
- बाँध: वनों का जलमग्न होना एवं लोगों का विस्थापन।
- नाभिकीय ऊर्जा: रेडियोधर्मी अपशिष्ट की समस्या।
इसीलिए सतत विकास (Sustainable Development) की आवश्यकता है, जिसका अर्थ है वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करना बिना भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता किए।
5. ऊर्जा का भविष्य
- जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर संक्रमण आवश्यक है।
- भारत ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission) जैसी अनेक योजनाएँ प्रारंभ की हैं।
- भविष्य में विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के संयोजन से एक विश्वसनीय एवं टिकाऊ ऊर्जा प्रणाली विकसित की जाएगी।
निष्कर्ष
ऊर्जा मानव सभ्यता की आधारशिला है। कोयला और पेट्रोलियम जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों ने औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन इनके भंडार तेजी से समाप्त हो रहे हैं और ये पर्यावरण को भी नुकसान पहुँचा रहे हैं। सौर, पवन, ज्वारीय, भू-तापीय तथा नाभिकीय ऊर्जा जैसे गैर-पारंपरिक स्रोत एक सतत एवं सुरक्षित भविष्य की कुंजी हैं। ऊर्जा का विवेकपूर्ण उपयोग, नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा तथा नई तकनीकों का विकास ही हमारी बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करते हुए पृथ्वी की रक्षा कर सकता है।